कलम से - ऑनलाइन कवि सम्मेलन-  अर्चना पाठक  निरंतर की कविता उन्ही की जुबानी

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गीत

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पहले पाती प्रेम की
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मौन ही करती रही,
मौन से संवाद।
दिल बहुत व्याकुल हुआ,
और घिर गया अवसाद।

बिन तुम्हारे रह न पाऊँ,
कह रही मैं तुमसे आज
चाँद भी अब मुँह चिढा़ये,
आ रही है मुझको लाज।


छेड़ कर झंकार तुम
दे गये इक याद
मौन ही करती रही
मौन से संवाद।
दिल बहुत....

हाथों में मिल गये हाथ
और नैन हैं अभिराम ।
भीगती पलकें झुकी
फिर नहीं विश्राम ।

मूक भी वाचाल है
दिल हुआ आबाद।
मौन ही करती रही
मौन से संवाद
दिल बहुत..... ... Más informaciones

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